सावन गगने घोर घन घटा ….

आणखी एक पावसाळी गीत.. हे गाणे राधा कृष्णा चेच आहे. खरे तर राधेचे आहे..पावसाळी अंधारी रात्र आणि दुर कुठे तरी कुंज बना त कृष्णाची बासरी ऐकू येतेय.. आणि राधेला कुंज वनात जायचे आहे..

हे गाणे रवीन्द्र नाथानी ब्रज बोली मध्ये लिहिले आहे..उत्तर प्रदेशातील मथुरा, आग्रा इथली हि बोली भाषा …हि भाषा बरीचशी हिंदी भाषेशी मिळतीजुळती आहे..हि ब्रज बोलीतील गाणी रवींद्र नाथानी “भानु सिंह ” या टोपण नावानी रचलित..ब्रज बोलीतील त्यांच्या गीत रचना “भानुसिंहेर पदावली” म्हणून प्रसिद्ध आहेत… या गाण्यात स्वतःचे नावपण त्यांनी खूप सुंदर रित्या गुंफलंय..

बांगला लिपीत ले गाणे :

 শাঙনগগনে ঘোর ঘনঘটা,  নিশীথযামিনী রে।
     কুঞ্জপথে, সখি, কৈসে যাওব অবলা কামিনী রে।
     উন্মদ পবনে যমুনা তর্জিত, ঘন ঘন গর্জিত মেহ।
     দমকত বিদ্যুত, পথতরু লুন্ঠিত, থরহর কম্পিত দেহ
     ঘন ঘন রিম্‌‍ঝিম্‌ রিম্‌‍ঝিম্‌ রিম্‌‍ঝিম্‌ বরখত নীরদপুঞ্জ।
     শাল-পিয়ালে তাল-তমালে নিবিড়তিমিরময় কুঞ্জ।
     কহ রে সজনী, এ দুরুযোগে কুঞ্জে নিরদয় কান
     দারুণ বাঁশী কাহ বজায়ত সকরুণ রাধা নাম।
     মোতিম হারে বেশ বনা দে, সীঁথি লগা দে ভালে।
     উরহি বিলুন্ঠিত লোল চিকুর মম বাঁধহ চম্পকমালে।
     গহন রয়নমে ন যাও, বালা, নওলকিশোরক পাশ।
     গরজে ঘন ঘন, বহু ডর পাওব, কহে ভানু তব দাস॥

हेच गाणे देवनागरी लिपीत ..

राधा :

सावन गगने घोर घन घटा … निशिथ यामिनी रे….

( श्रावणआकाशी घन मेघ (आणि ) हि अंधारी रात्र )

कुन्जपथे, सखी , कैसे जाऊं अबला कामिनी रे..

( हे सखी, कुंजवनात मी (एक) अबला कामिनी कशी जावू ?? )

गोपी (कोरस ) :

उन्मद पवने यमुना त र्जी त , घन घन गर्जित मेह ..

( उन्मत्त हवेत यमुना उफाळलीय, घन घन गरजणारे मेघ.. )

दम कत विदयुत , पथ तरु लुंठित , थर हर कंपित देह ..

( चमकणारी विद्युत आणि कोसळले वृक्ष ..थरथरणारे देह .. )

घन घन , रिम झिम रिम झिम रिम झिम बरसत नीरद पुंज ..

( घन घन रिमझिम रिम झिम, रिम झिम बरसणारे मेघ ..)

शाल पियाले , ताल तमाले ..निबिड तिमिरमय कुंज..

(शाल पियाल , ताल – तमाल (वृक्षांचा ) अंधःकारमय मेळ .. )

राधा :

कह रे सजनी , ऐ दूर्योगे कुंजे निर्दय कान ..

( सांग ना सखी , अशा वेळी कुंज वनात निर्दय पणे .. )

दारुण बांशी काहे बजायत सक रु ण राधा नाम ..

( का ती बासरी गातेय राधा (राधा ) नांव .. )

मोतिम हारे बेश बना दे , सिंथि लागा दे भाले ..

( मोत्यांची माळ घालू दे..सिंदूर लावू दे.. )

उरही विलुंठीत लोल चिकुर मम बान्धह चम्पक माले ..

( लांब सडक हे केस चंपक माळेत बांधून दे.. )

गोपी (कोरस):

गहन रायन मे ना जाओ , बाला , नवल किशोर के पास ..

( घन अरण्यात , त्या नव किशोर (कृष्णा ) कडे नको जाऊस ..)

गरजे घन घन, बहू डर पाओबो , कहे भानू , तव दास ..

(घन गरजणारे हे मेघ..खूपच भयप्रद ..सांगे भानू तुझा दास … ).

लताजींच्या गोड आवाजात हे गोड गाणे ऐकु या..

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.