एक छोटेसे कवन ..वर्षा ऋतू वर रवींद्र नाथानी रचलेले..ह्या कवितेची शब्द रचना खूप सुंदर ..
पावसाचा जोर आता खूपच वाढला आहे.. आणि चारी बाजूने भरून आलेले आभाळ, कोसळणारा पाऊस आणि ओथंबून निघालेले अरण्य ह्याचे नितांत सुंदर वर्णन ह्या गाण्यात आहे..गाण्यातले शब्द संस्कृत भाषेतील असल्याने समजायला पण अतिशय सोपे..
मूळ गाणे –
হৃদয়ে মন্দ্রিল ডমরু গুরু গুরু,
ঘন মেঘের ভুরু কুটিল কুঞ্চিত,
হল রোমঞ্চিত বন বনান্তর–
দুলিল চঞ্চল বক্ষোহিন্দোলে মিলনস্বপ্নে সে কোন্ অতিথি রে।
সঘন-বর্ষণ-শব্দ-মুখরিত বজ্রসচকিত ত্রস্ত শর্বরী,
মালতিবল্লরী কাঁপায় পল্লব করুণ কল্লোলে–
কানন শঙ্কিত ঝিল্লিঝংকৃত॥
देवनागरी लिपीत हेच गाणे..
हृदये मंद्रिल डमरु गुरु गुरू ,
घन मेघेर भुरु कुटिल कुंचित ,
होलो रोमांचित बन बनांत र –
दुलिलो चंचल बखोहिंदोले मिलन स्वप्ने शे कोन अतिथि रे..
सघन – बर्षण – शब्द मुखरितो वज्र सचकित त्रस्त शर्वरी ,
मालती वल्लरी कापाय पल्लव करुण कल्लोले –
कानन शंकित झिल्ली झंकृत …
( झिल्ली झंकृत = रात किड्यांची किर किर )
सत्यजित रे यांच्या ‘रवींद्र नाथ टागोर ‘ ह्या documentary मध्ये हे गाणे चित्रित केले आहे..