आज रवींद्र नाथानी रचलेले एक प्रेम गीत ऐकुया…ह्या गीतात एक प्रेमिका आपल्या प्रेमीची वाट पाहत आहे आणि तिला खात्री आहे कि ‘तो येईल’…
আজি গোধূলিলগনে এই বাদলগগনে
তার চরণধ্বনি আমি হৃদয়ে গণি–
‘সে আসিবে’ আমার মন বলে সারাবেলা,
অকারণ পুলকে আঁখি ভাসে জলে॥
অধীর পবনে তার উত্তরীয় দূরের পরশন দিল কি ও–
রজনীগন্ধার পরিমলে ‘সে আসিবে’ আমার মন বলে।
উতলা হয়েছে মালতীর লতা, ফুরালো না তাহার মনের কথা।
বনে বনে আজি একি কানাকানি,
কিসের বারতা ওরা পেয়েছে না জানি,
কাঁপন লাগে দিগঙ্গনার বুকের আঁচলে–
‘সে আসিবে’ আমার মন বলে॥
हि कविता मराठीत…
आजि गोधुलि लगने ए इ बादल गगने ..
(ह्या संध्या काळी, ह्या मेघ दाटून आलेल्या वेळी.. गोधुली ल ग न – जुन्या काळी संध्या काळी गायी गोठ्यात परत येताना धूळ उडवत येत..ती धूळ म्हणजे गोधुली आणि अशी वेळ म्हणजे गोधुळी वेळ..[गोधुळी लगन ..])
तार चरण ध्वनि आमि हृदये गोनि —
(त्याचे चरण ध्वनी मी मोजत राहते...)
‘शे आशिबे ‘ आमार मन बोले सारा बेला ,
(‘तो येणार’ माझे मन सांगतेय….)
अकारण पुलके आँखी भाशे जले ..
(उगीच थरथरतेय…डोळे पाण्याने भरून येताहेत…)
अधीर पवने तार उत्तरीय दुरेर परषन दिलो कि ओ —
(दूरवर उडणाऱ्या त्याच्या शेल्याचा स्पर्श ह्या वाऱ्यात वाहतोय...)
रजनी गंधार परिमळे ‘शे आशिबे ‘ आमार मन बोले ..
(भरून राहिलेला राजनीगंधेचा सुवास खात्री देतोय…’तो येणार’..)
उतला होयेछे मालतीर लता , फुरालो ना ताहार मनेर कथा ..
(डोलत गुंजणारी हि मधू मालती लते ची फुले…)
बने बने आजि एकि काना कानि ..
(गर्द जंगलात एकच कुजबुज…)
किशेर वार्ता ओ रा पेयेंछे ना जानि ..
(कुठले गुपित त्याना कळलंय काय माहीत…)
कांपन लागे दिग अंगणार बुकेर आंचले —
(ह्या दशदिशाही कंपित )
‘शे आशिबे’ आमार मन बोले…
(‘तो येणार’ माझे मन सांगतेय….)
हे गाणे ऐकुया श्री सागर सेन ह्यांच्या आवाजात…