आज एक पूजा परजायेर गाणे ऐकुया .. ह्या गाण्यात रविंद्रनाथ संध्याकाळ चे वर्णन करताहेत. ही संध्याकाळ म्हणजे आयुष्याची पण संध्याकाळ आणि अशा वेळी हळू हळू दाटून येणारा अंधार म्हणजे जणू आईचा थकलेल्या जगावर पसरणारा पदर आहे.. अशी कल्पना केलेली आहे..
সন্ধ্যা হল গো– ও মা, সন্ধ্যা হল, বুকে ধরো।
অতল কালো স্নেহের মাঝে ডুবিয়ে আমায় স্নিগ্ধ করো॥
ফিরিয়ে নে মা, ফিরিয়ে নে গো– সব যে কোথায় হারিয়েছে গো
ছড়ানো এই জীবন, তোমার আঁধার-মাঝে হোক-না জড়ো॥
আর আমারে বাইরে তোমার কোথাও যেন না যায় দেখা।
তোমার রাতে মিলাক আমার জীবনসাঁজের রশ্মিরেখা।
আমায় ঘিরি আমায় চুমি কেবল তুমি, কেবল তুমি–
আমার ব’লে যা আছে, মা, তোমার ক’রে সকল হরো॥
*****
संध्या होलोगो ओ मा, संध्या होलो, बूके धोरो ..
(संध्याकाळ झाली आता आई, हृदयाशी घे तू मला..)
अतल कालो स्ने हे र माझे डुबीए आमाय स्निग्ध कोरो ..
(तुझ्या ह्या काळ्याशार स्नेहल अंधारात मला बुडून जावू दे )
फिरीये ने मा.. फिरीये ने गो — सब जे को थाय हारिये छे गो..
(मला परत तुझ्या कडे घे ऊन चल ग आई, सर्व काही कुठे हरवून गेले ग ..)
छ डा नो ए ई जीवन, तोमार अंधार माझे होक ना जोडो ..
(इतस्ततः विखुरलेले हे आयुष्य माझे, पुनः तुझ्या कुशीत एक होऊ दे..)
आर आ मा रे बाइरे तोमार कोथाय जेनो ना जाय देखा
(परत मला नको कुठे तुझ्या पासून दूर सोडूस..)
तोमार राते मिलाक आमार जीवन सांजेर रश्मि रेखा..
(तुझ्या ह्या नर्मशार रात्री, मिस ळून जावू देत माझी संध्या किरणे..)
आमाय घिरी आमाय चुमी, केबोल तुमी केबोल तुमी..
(ह्या अशा वेळी मला बिलगून केवळ तुलाच राहू दे..)
आमार बोले जा आछे मा, तोमार करे सकल हे रो..
(माझे जे काही आहे ना आई, ते सगळे तुझ्यातच हरवून जावू दे..)
*******
हे गाणे ऐकुया पूर्वा दाम ह्यांच्या आवाजात..