रवींद्र नाथ जेव्हा चीन आणि जपान ला गेले होते तेव्हा तिथल्या चाहत्यांनी कागदी पंख्यावर किंवा रुमालावर काही तरी लिहून द्या अशी विनंती केली..त्या साठी रवींद्र नाथानी लघु कविता रचल्या..त्यांच्या “स्फुल्लिंग” काव्य संग्रहातील काही कविता इथे देत आहे..
हि पहिली कविता आहे जपान देशाला उद्देशून..
জাপান, তোমার সিন্ধু অধীর,
প্রান্তর তব শান্ত,
পর্বত তব কঠিন নিবিড়,
কানন কোমল কান্ত।
हीच कविता मराठीत..
जपान, तोमार सिंधू अधीर,
( तोमार – तुझा ..)
प्रांतर तब शांत,
(प्रांतर – प्रांत ..)
पर्वत तव कठीण निबिड,
कानन कोमल कांत..
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दुसरी कविता—
বহু দিন ধ’রে বহু ক্রোশ দূরে
বহু ব্যয় করি বহু দেশ ঘুরে
দেখিতে গিয়েছি পর্বতমালা, দেখিতে গিয়েছি সিন্ধু।
দেখা হয় নাই চক্ষু মেলিয়া
ঘর হতে শুধু দুই পা ফেলিয়া
একটি ধানের শিষের উপরে
একটি শিশিরবিন্দু।
हि कविता मराठीत..
बहू दिन धरे बहू कोस दुरे
(खूप दिवस , खूप दूर वरचे.…)
बहू व्यय करि बहू देश घुरे
(खूप खर्च करून फिरून आलो मी कित्येक देश..)
देखिते गिये छि पर्वत माला,
(पहिल्या कित्येक पर्वत रांगा,)
देखिते गिये छि सिंधू
(पाहिला अथांग सागर..)
देखा होय नाई च खु मेलिया
(पण नाही बघितला मी….नाई – नाही , च खु – चक्षु ..)
घर होते शुधु दु इ पा फेलिया
(घराजवळच एका हाताच्या अंतरावर.. ..)
एक टि धानेर शि षे र ओपोरे
(एका भाताच्या रोपा वरील .)
एक टि शिशिर बिंदू …
(एक छोटासा दव बिंदू.….)
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तिसरी कविता —
যত বড়ো হোক ইন্দ্রধনু সে
সুদূর-আকাশে-আঁকা,
আমি ভালোবাসি মোর ধরণীর
প্রজাপতিটির পাখা।
हि कविता मराठीत..
जतो बडो होक इंद्र धनू शे
(कितीहि मोठे असूदेत ते इंद्र धनुष्य )
सुदूर – आकाशें आं का ,
(दूरवर आकाशी रेखलेले..)
आमि भालो बा शि मोर धरणी र
(मला आवडतात परंतु ह्या धरतीवरील )
प्रजापति टिर पाखा …
(फुलपाखराचे पंख…प्रजापती – फुलपाखरू , पाखा – पंख .)
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