आमार प्राणेर पोरे चोले गेलो के ….

गेल्या आठवड्यात ‘कादंबरी’ बघितला…ह्या सिनेमात रवींद्र कालीन बांगला संस्कृती खूप सुंदर दाखवली आहे..कादंबरी देवीची व्यक्तिरेखा खूपच चटका लावून गेली..

हे गाणे रवींद्र नाथानी कादंबरी देवी च्या मृत्यू पश्चात रचले..त्यांचा अकाली मृत्यू रवींद्र नाथा साठी अतिशय वेदना दायी होता..ह्या गाण्याविषयी कविंचे मनोगत राणी चंद ह्यांनी नमूद करून ठेवले आहे..राणी चंद त्या विषयी लिहितात.. “कवी म्हणत …”हे बघ, जे मरून जातात..ते काही परत येत नाहीत…अशी समजूत कि आत्मा येऊन दर्शन देतो..पण ते काही खरे नाही..नोतून बौठाण (नवीन वहिनी – रवींद्र नाथ कादंबरी देवींना नोतून बौठाण म्हणून संबोधत असत..) गेल्या..केवढा त्रास झाला..अजूनही आठवतो तो दिवस..बरेच दिवस रात्री झोप नाही..रात्र रात्र आकाशा कडे पाहात विनवणी करायचो..वहिनी तुम्ही कुठे आहात?? एकदा तरी दिसू द्यात..असे करत किती रात्री गेल्या..त्यावेळी मी हेच गाणे म्हणायचो..आमार प्राणेर पोरे चोले गेलो के … (कोण आहे जे माझ्या जीवा भावा चे जे असे अकस्मात निघून गेले??)” आणि कवींनी हे गाणे गायला सुरवात केली..कवी पुढे म्हणाले..आणि मजा अशी कि जे असे अकाली निघून जातात..त्यांचे वय काही वाढत नाही..माझी नोतून बौठाण — ती तशीच छोटी शी तरुणी म्हणूनच आठवते….आणि मी बघ किती म्हातारा झालोय…..”

—राणी चंद, गुरु देव , विश्व भारती विभाग, कलीकाता , श्रावण १३९४.

नुकतेच अभिनेता सुशांत सिंग राजपूत चे निधन झाल्याचे वाचले..त्याचा ब्योमकेश बक्षी बघितला होता..एव्हढा तरुण versatile talented actor आणि त्याचे असे अकस्मात जाणे सर्वानाच धक्का देऊन गेले..वाटले आपल्याच घरातला कोणी तरुण अकाली निघून गेला..हे गाणे काही अंशी त्याला पण लागू पडते…

আমার      প্রাণের ‘ পরে চলে গেল কে
বসন্তের     বাতাসটুকুর মতো।
সে যে      ছুঁয়ে গেল, নুয়ে গেল রে–
ফুল        ফুটিয়ে গেল শত শত।
সে         চলে গেল, বলে গেল না– সে   কোথায় গেল ফিরে এল না।
সে         যেতে যেতে চেয়ে গেল   কী যেন গেয়ে গেল–
তাই       আপন-মনে বসে আছি কুসুমবনেতে।
সে         ঢেউয়ের মতন ভেসে গেছে,   চাঁদের আলোর দেশে গেছে,
           যেখান দিয়ে হেসে গেছে,   হাসি তার   রেখে গেছে রে–
           মনে হল আঁখির কোণে   আমায় যেন ডেকে গেছে সে।
আমি       কোথায় যাব, কোথায় যাব, ভাবতেছি তাই একলা বসে।
সে         চাঁদের চোখে বুলিয়ে গেল ঘুমের ঘোর।
সে         প্রাণের কোথায় দুলিয়ে গেল ফুলের ডোর।
           কুসুমবনের উপর দিয়ে কী কথা সে বলে গেল।
           ফুলের গন্ধে পাগল হযে সঙ্গে তারি চলে গেল।
           হৃদয় আমার আকুল হল,   নয়ন আমার মুদে এল রে–
           কোথা দিয়ে কোথায় গেল সে॥

हे गाणे मराठीत…

आमार प्राणेर पोरे चोले गेलो के

(ते कोण जे असे अकस्मात निघून गेले????)

बसंतेर बाताशटुकूर मतो …

(वसंत ऋतू तील वाऱ्या प्रमाणे…)

शे जे छुये गेलो , नूये गेलो रे —

(हलकेच स्पर्शून गेले...)

फुल फुटीये गेलो शत शत …

(जाता जाता फुल उमलवत गेले ….)

शे चोले गेलो, बोले गेलो ना– शे कोथाय गेलो फिरे एलो ना …

(ती निघून गेली पण निरोप नाही घेतला कुठे गेलीय जी आता परत येईना..)

शे जेते जेते चे ये गेलो कि जेनो गेये गेलो —

(जाता जाता निरखून गेली ..काही तरी गुणगुणत गेली…)

ताई आपन – मने बोशे आ छि कुसुम बनेते ..

(म्हणून बसलोय एकटाच ह्या बागेत…)

शे ढेउयेर मोतोन भेशे गे छे , चांदेर आलोर देशे गे छे,

(ती लाटे प्रमाणे वाहून गेली..कोण चंद्राच्या देशी गेली…)

जेखान दिये हेशे गे छे, हाशी तार रेखे गे छे रे —

(जिथे ती हसत गेली..पण हसू तिचे ठेवून गेली…)

मने होलो आंखीर कोने आमाय जेनो डेके गे छे शे …

(असे वाटले डोळ्यांच्या कोनातून मला काही बोलून गेली…)

आमि कोथाय जाबो ,कोथाय जाबो भा बि ते छि ताई एकला बशे …

(एकटाच बसून विचार करतो कुठे जाऊ मी...)

शे चांदेर चोखे बुलिये गेलो घुमेर घोर…

(त्या चंद्रात विरघळून गेली ती ……)

शे प्राणेर कोथाय दुलीये गेलो फुलेऱ डोर ..

(हलकेच मला हि स्पर्शून गेली...)

कुसुम बनेर उपोर दिये कि कथा शे बोले गेलो ..

(ह्या फुलांना ती काही सांगून गेली…)

फुलेऱ गंध पागल होये संगे ता रि चोले गेलो —

(कि त्यांचा सुवास हि तिच्या सोबत निघून गेला…)

हृदय आमार आकूल होलो, नयन आमार मुदे एलो रे —

(हृदय माझे व्याकुळ झालेय..डोळे भरलेत पाण्याने..)

कोथा दिये कोथाय गेलो शे —-

(कुठून कुठे गेलीय ती….)

कुणी अनामिकाने केलेले ह्या कवितेचे इंग्लिश रूपांतर….

LIKE the faint breath of Spring
  she softly touched my heart
  and then drifted away.
She stooped delicately as she touched me,
  and I felt like a tree in blossom.
She left without a word
  as to whither she was bound,
  and she did not come back.
Only, she cast her look behind
  as she went away, and sang a few notes
  whose meaning I do not remember.
So, here I sit in the bower,
  lost in thought and waiting for her.
Like a wave she has drifted away–
  perhaps to the shores of the far-away moon.
I seem to see traces of her smile
  all along the course of her journey.
I thought in the corner of her eyes there was
  the hint of an invitation–
  only, I do not know where.
So, here I sit all by myself —
  lost in thought as to where I should go.
The eyes of the moon
  she has touched with slumber,
  even as she touched a corner of my heart
  as she drifted away over the bower.
All the fragrance of the garden
  followed in her footsteps.
As I sit here in the garden,
  a profound longing assails me,
  and my eyes drop with weariness trying
  to think which way she went and where. 

हे गाणे ऐकुया इंद्राणी सेन ह्यांच्या आवाजात…

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