केनो बाजाओ कांकण …

हे आणखी एक प्रेम गीत पाहुया..ह्या गाण्या बद्दल रवींद्र नाथ लिहितात..हि कविता एक पूर्ण कल्पना विलास आहे..एक रमणी पाणी भरण्या नदी काठी गेलेली आहे..पण ती तिथेच रेंगाळून राहिलीय..तिची कळशी घेऊन ती पाण्यात खेळतेय ..कधी हाताने पाणी उडवतेय…तिच्या हातातील बांगड्या त्यावेळी किणकिण करताहेत..असे वाटतेय कि ती कुणाची तरी वाट पाहतेय..आता संध्याकाळ होत आलेय..आणि तिची सखी म्हणतेय अग, का हि सारखी बांगड्याची किणकिण ?? चल, पाणी भरून आता घरी जाऊया…”

কেন     বাজাও কাঁকন কনকন কত ছলভরে।
    ওগো,   ঘরে ফিরে চলো কনককলসে জল ভরে॥
    কেন     জলে ঢেউ তুলি ছলকি ছলকি কর খেলা।
কেন     চাহ খনে খনে চকিত নয়নে কার তরে   কত   ছলভরে॥
    হেরো    যমুনা-বেলায় আলসে হেলায় গেল বেলা,
যত হাসিভরা ঢেউ করে কানাকানি কলস্বরে   কত   ছলভরে।
    হেরো    নদীপরপারে গগনকিনারে মেঘমেলা,
তারা    হাসিয়া হাসিয়া চাহিছে তোমারি মুখ’পরে   কত   ছলভরে॥

हे गाणे मराठीत…

केनो बाजाओ काकण कणकण कतो छल भरे….

(का खट्याळ पणे हि बांगड्याची किणकिण??? .. केनो – का ..छल भरे -खट्याळ पणे , खोडकर...)

ओगो , घरे फिरे चलो कनक कलशे जल भरे ,,,

(अग, कळशीत पाणी भरून चल घरी…)

केनो जले ढे उ तू लि छलकि छलकि करो खेला …

(पाणी उडवीत लाटांशी खेळतेयस…. ढे उ – लाटा …)

केनो चाह खने खने चकित नयने कार तरे कतो छल भरे..

(मध्येच चकित नजरेने काय बघतेयस???)

हेरो जमुना – बेलाय आलशे हेलाय गेलो बेला,

(किती वेळ गेला ह्या नदी किनारी….)

जतो हाशीभरा ढे उ करे कानाकानि कल स्वरे कतो छल भरे..

(खळखळणारे हे सावळे पाणी….)

हेरो नदी पर पारे गगन किनारे मेघ मेला,

(हे बघ, नदी किनारी आकाशी मेघ माला..)

तारा हाशिया हाशिया चाहिछे तोमारि मुख परे कतो छल भरे..

(हे मेघ पण तुझ्याकडेच हसून पाहताहेत खट्याळ पणे……)

रवींद्र नाथानी केलेले ह्या गीताचे इंग्लिश रूपांतर…

Why do you sit there and jingle your bracelets in mere idle sport?
    Fill your pitcher. It is time for you to come home.
    Why do you stir the water with your hands and fitfully glance at the road for some one in mere idle sport?
    Fill your pitcher and come home.
    The morning hours pass by—the dark water flows on.
    The waves are laughing and whispering to each other in mere idle sport.
    The wandering clouds have gathered at the edge of the sky on yonder rise of the land.
    They linger and look at your face and smile in mere idle sport.
    Fill your pitcher and come home. 

 –The Gardener: Rabindranath Tagore, MacMillan, London 1919   

हे गाणे ऐकुया श्रीमती सुचित्रा मित्र ह्यांच्या आवाजात…


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