इथे चांगलाच पाऊस पडतोय..सर्व नद्या दुथडी भरून वाहताहेत..रवींद्र नाथाचे एक पाऊस गाणे आज पाहूया..ह्या गाण्यात ते आषाढ जो पावसाचा महिना, त्याला उद्देशून म्हणताहेत..हे आषाढ, कुठून असा भर भरून आला आहेस तू?? ह्या माळरानावर तुझी जय ध्वजा रोवून उभा आहेस…तुझ्या येण्याने सारी सृष्टी नाचू डोलू लागली आहे…
আষাঢ়, কোথা হতে আজ পেলি ছাড়া।
মাঠের শেষে শ্যামল বেশে ক্ষণেক দাঁড়া॥
জয়ধ্বজা ওই-যে তোমার গগন জুড়ে।
পুব হতে কোন্ পশ্চিমেতে যায় রে উড়ে,
গুরু গুরু ভেরী কারে দেয় রে সাড়া॥
নাচের নেশা লাগল তালের পাতায় পাতায়,
হাওয়ার দোলায় দোলায় শালের বনকে মাতায়।
আকাশ হতে আকাশে কার ছুটোছুটি,
বনে বনে মেঘের ছায়ায় লুটোপুটি–
ভরা নদীর ঢেউয়ে ঢেউয়ে কে দেয় নাড়া॥
हे गाणे मराठीत…
आषाढ , को था होते पे लि छाडा ..
माठेर शेषे श्यामल वेशे खणेक दांडा …
जय ध्वजा ओई -जे तोमार गगन जुडे ..
पू ब होते कोन पश्चिमेते जाय रे उडे,
गुरु गुरु भेरी कारे देय रे शाडा ..
नाचेर नेशा लागलो तालेर पाताय पाताय ,
हवाय दोलाय दोलाय शालेर बन के माताय
आकाश होते आकाशें कार छू टो छू टी,
बने बने मेघेर छायाय लुटो पुटी —
भरा नदीर ढे उ ये ढे उ ये के देय नाडा …
हे गाणे ऐकुया श्रीकांत आचार्य ह्यांच्या स्वरात…