ए मणिहार आमाय नाहि शाजे

असे म्हणतात कि हे गीत रवींद्र नाथानी जेव्हा ब्रिटिशांनी दिलेली “सर” उपाधी परत केली तेव्हा रचले…..ते म्हणतात ह्या रत्न माला (बक्षिसे ) मला नाही शोभत..हि अशी पारितोषिके मला माझ्या ध्येयापासून विचलित करतात..सतत त्यांच्याच विचार करतो आणि कामात लक्ष नाही लागत..तुझ्या समोर ह्या माला घालून येताना मी लज्जित होतो ..म्हणून ह्या रत्न माळा मी तुला (परमेश्वराला) अर्पण करतो..तेव्हाच मला समाधान मिळेल…

 এ মণিহার আমায় নাহি সাজে–
এরে    পরতে গেলে লাগে,   এরে ছিঁড়তে গেলে বাজে॥
               কণ্ঠ যে রোধ করে,   সুর তো নাহি সরে–
       ওই দিকে যে মন পড়ে রয়,   মন লাগে না কাজে॥
                      তাই তো বসে আছি,
       এ হার তোমায় পরাই যদি তবেই আমি বাঁচি।
              ফুলমালার ডোরে   বরিয়া লও মোরে–
       তোমার কাছে দেখাই নে মুখ    মণিমালার লাজে॥

हे गाणे मराठीत…

ए मणिहार आमाय नाहि शाजे —

एरे पोरते गेले लागे, एरे छिंडते गेले बाजे …

कंठ जे रोध करे , सूर तो नाही सरे (स्वरे) —

ओई दिके जे मन पोडे रॉय, मन लागे ना काजे —

ताई तो बोशे आ छि,

ए हार तोमाय पराई जोदि तबेई आमि बांचि …

फुल मालार डोरे बरिया ल ओ मोरे —

तोमार काछे देखाई ने मुख मणि मालार लाजे …

रवींद्र नाथानी केलेला ह्या गाण्याचा इंग्लिश अनुवाद…

It decks me only to mock me, this jewelled chain of mine.
    It bruises me when on my neck, it strangles me when I struggle to tear it off.
    It grips my throat, it chokes my singing.
    Could I but offer it to your hand, my Lord, I would be saved.
    Take it from me, and in exchange bind me to you with a garland, for I am ashamed to stand before you with this jewelled chain on my neck.

–Sir  Rabindranath Tagore, Fruit-Gathering, Macmillan, New York, 1916.  

हे गाणे ऐकुया हेमंत कुमार ह्यांच्या .आवाजात…

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