बाउल संगीत एक लोक संगीताचा प्रकार बंगाल मध्ये खूपच प्रचलित आहे..लालन फकीर हा एक विख्यात बाउल..त्याच्या रचना अजूनही गायल्या जातात..एकताऱ्याच्या सुरात गायली जाणारी बाउल गाणी अजून ही लोकप्रिय आहे..रवींद्र नाथाचे हे गाणे लालन फकीरच्या एका कवितेवर आधारित आहे…
जर तुझी साद ऐकून कुणीहि नाही आले किंवा किती हि अडचणी आल्या तरी तू तुझ्या मार्गावर खंबीर पणे चालत राहा.. असे कवी ह्या कवितेत सांगतात..एक खूपच स्फूर्ती दायक रचना…
যদি তোর ডাক শুনে কেউ না আসে তবে একলা চলো রে।
একলা চলো, একলা চলো, একলা চলো, একলা চলো রে॥
যদি কেউ কথা না কয়, ওরে ওরে ও অভাগা,
যদি সবাই থাকে মুখ ফিরায়ে সবাই করে ভয়–
তবে পরান খুলে
ও তুই মুখ ফুটে তোর মনের কথা একলা বলো রে॥
যদি সবাই ফিরে যায়, ওরে ওরে ও অভাগা,
যদি গহন পথে যাবার কালে কেউ ফিরে না চায়–
তবে পথের কাঁটা
ও তুই রক্তমাখা চরণতলে একলা দলো রে॥
যদি আলো না ধরে, ওরে ওরে ও অভাগা,
যদি ঝড়-বাদলে আঁধার রাতে দুয়ার দেয় ঘরে–
তবে বজ্রানলে
আপন বুকের পাঁজর জ্বালিয়ে নিয়ে একলা জ্বলো রে॥
हेच गाणे मराठीत..
जदि तो र डाक सुने केउ ना आशे तबे एकला चलो रे ..
(जर तुझी हाक ऐकून नाही कुणी साथीला आले तर एकटाच चल ..)
एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे ..
(एकटाच चालत राहा...)
ज दि केउ कथा ना कय , ओरे ओरे ओ अ भा गा ,
(जर नाही कुणी तुझ्याशी बोलले..)
ज दि सबाई था के मुख फिराये सबाई करे भय —
(जर संकट काळी सर्वानीच घाबरून तोंड फिरवले ..)
तबे प रा न खुले
(तर प्राण पणे ..)
ओ तु इ मुख फुटे तो र मनेर कथा एकला बोलो रे ..
(तुझ्या मनातील गोष्टी तूच बोल…)
ज दि सबाई फिरे जाय, ओरे ओरे ओ अ भा गा ,
(जर सगळेच निघून गेले ..)
ज दि गहन पंथें जाबा र काले केहू फिरे ना चाय —
(कुणीही नाही वळून पा हिले…)
तबे पथेर काटा
(तर रस्त्यातील काटे…)
ओ तुइ रक्त माखा चरण तले एकला दलो रे ..
(तुझ्या जखमी पावलांतुन तूच दूर कर…)
जदि आलो ना धरे, ओरे ओरे ओ अ भा गा ,
(जर सर्वत्र अंधार...)
जदि झड बादले अंधार राते दुआर देय घरे —
(वादळी जीवन काळ..)
त बे वज्रा नले
(तर वेदनेचे विद्युत उजळवून..)
आपन बुकेर पांजर ज्वालीये निये एकला ज्वलो रे…
(तूच आत्मज्योत प्रकाशित कर...)
ह्या कवितेचे रवींद्र नाथानी केलेले इंग्लिश रूपांतर ….
IF they answer not to thy call walk alone,
If they are afraid and cower mutely facing
the wall,
O thou of evil luck,
open thy mind and speak out alone.
If they turn away, and desert you when
crossing the wilderness,
O thou of evil luck,
trample the thorns under thy tread,
and along the blood-lined track travel
alone.
If they do not hold up the light
when the night is troubled with storm,
O thou of evil luck,
with the thunder flame of pain ignite
thine own heart
and let it burn alone.
–Rabindranath Tagore, Poems, Visva-Bharati, 1942
हे गाणे ऐकुया सुचित्रा मित्र ह्यांच्या आवाजात…