हे खनिकेर अतिथी …

आज हे एक प्रेम गीत ऐकुया…

হে ক্ষণিকের অতিথি,
    এলে প্রভাতে কারে চাহিয়া
        ঝরা শেফালির পথ বাহিয়া॥
কোন্‌ অমরার বিরহিণীরে   চাহ নি ফিরে,
    কার বিষাদের শিশিরনীরে   এলে নাহিয়া॥
        ওগো অকরুণ, কী মায়া জানো,
            মিলনছলে বিরহ আনো।
    চলেছ পথিক আলোকযানে   আঁধার-পানে
        মনভুলানো মোহনতানে   গান গাহিয়া॥

हि कविता मराठीत…

हे खनिकेर अतिथी,

(हे क्षणिक अतिथी,)

ए ले प्रभाते कारे चाहिया ..

(कुणासाठी ह्या सकाळी येणे केले??)

झरा शेफालीर पथ बाहीया ..

(विखुरलेल्या प्राजक्ताची फुले ओलांडून…)

कोन अमरार विरहिणीरे चाह नि फिरे ..

(जणू कुणी विरहिणी.. मागे वळून न पाहणारी....)

कार विषादेंर शिशिर नीरे एले नाहीया …

(कुठल्या दुःखाचे अश्रू भरून आलेले ..)

ओगो अकरुण, कि माया जानो,

(हे निर्दयी, काय तुझे माया जाल..)

मिलन छले विरह आनो ..

(भेट होतेय असे भासवत विरह देणारे…)

चोलेछे पथिक आलोक जाने अंधार पाने

(ह्या अंधाऱ्या वाटेवर प्रकाशाची आस धरून चालतोय ..)

मन भुलानो मोहन ताने गान गाहिया …

(मनावर कुणा मोहमयी सुरांचे गारुड पांघरून .)

हे गाणे ऐकुया श्री चिन्मय चट्टोपाध्याय ह्यांच्या आवाजात…

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