आकाश होते खोसलो तारा …

रात्री उल्कापात होताना आपण बरेच वेळा पाहतो..आकाशातून पडणाऱ्या एका उल्केबद्दल रचलेले हे एक रवींद्र गीत…

আকাশ হতে খসল তারা   আঁধার রাতে পথহারা॥
    প্রভাত তারে খুঁজতে যাবে– ধরার ধুলায় খুঁজে পাবে
                তৃণে তৃণে শিশিরধারা॥
দুখের পথে গেল চলে– নিবল আলো মরল জ্বলে।
   রবির আলো নেমে এসে   মিলিয়ে নেবে ভালোবেসে,
                দুঃখ তখন হবে সারা॥

हे गाणे .मराठीत..

आकाश होते खोसलो तारा अंधार राते पंथ हारा …

(आकाशातून पडतोय तारा, अंधाऱ्या रात्री पथ हरवलेला….)

प्रभात तारे खुंजते जाबे — धरार धुलोय खुन्जे पाबे …

(सकाळ त्याला शोधत जाईल ,,मिळेल (तारा) धरतीच्या धुळीत ..)

तृणें तृणें शिशिर धारा …

(तृण दल हि धुक्याने माखलेले ..)

दुःखेर पंथे गेलो चले — निबलो आलो मरलो ज्वले …

(दुःखी तारा निघून गेला..प्रकाश मंदावला..जळून गेला…)

रबीर आलो नेमे ए शे मिलीये नेबे भालो बेशे ,

(सूर्य प्रकाश येऊन त्याला प्रेमाने सामावून घेईल...)

दुःख तो खो न हॉबे सारा…

(दुःख त्यावेळी जाईल संपून...)

हे गाणे ऐकुया श्रीमती सुचित्रा मित्र ह्यांच्या आवाजात….

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