नुकतीच कोजागिरी पौर्णिमा साजरी झाली..रवींद्र नाथाचे हे पौर्णिमेच्या रात्री बद्दल चे गाणे आज पाहूया..
ते म्हणतात – पौर्णिमेचा आनंद लुटण्या साठी सर्व जण गेलेत बाहेर जंगलात..पण मी नाही जाणार बाहेर.. मी माझ्या ह्या घरीच राहणार..माझ्या ह्या घराला धुवून स्वच्छ करणार.. काय माहित त्याला माझी कधी आठवण येईल आणि तो कधी येईल..रवींद्र नाथाच्या ह्या कवितेतील “तो” म्हणजे परमेश्वर..ह्या कवितेचा गभीतार्थ असा कि सर्व जण सुखलोलुपतेत मग्न आहेत.. पण मी नाही होऊ शकणार..मला त्या परमेश्वराची आराधना करायची आहे..
আজ জ্যোৎস্নারাতে সবাই গেছে বনে
বসন্তের এই মাতাল সমীরণে॥
যাব না গো যাব না যে, রইনু পড়ে ঘরের মাঝে–
এই নিরালায় রব আপন কোণে।
যাব না এই মাতাল সমীরণে॥
আমার এ ঘর বহু যতন ক’রে
ধুতে হবে মুছতে হবে মোরে।
আমারে যে জাগতে হবে, কী জানি সে আসবে কবে
যদি আমায় পড়ে তাহার মনে
বসন্তের এই মাতাল সমীরণে॥
हे गाणे मराठीत..
आज ज्योत्स्ना राते सबाई गेछे बने ..
(सबाई – सर्व जण ..)
बसंतेर ए इ माताल समीरणे …
(माताल समीरणे – धुंद वारा..)
जाबो ना गो जाबो ना जे , रो इ नू पोडे घरेर माझे —
ए इ निरालाय रबो आपन कोने ..
जाबो ना ए इ माताल समीरणे..
आमार ए घर बहू जतन कोरे
धुते होबे मु छ ते हॉबे मोरे ..
आमारे जे जागते हॉबे, की जानी शे आसबे कोबे
ज दि आमाय पोडे ताहार मने
बसंतेर ए इ माताल समीरणे .
ह्या कवितेचे एडवर्ड थॉमसन ह्यांनी केलेले इंग्लिश रूपांतर..
THEY have all gone to the woods in this moonlit night,
In the south wind drunken with Spring’s delight.
But I will not go, will not go;
I will stay in the house, and so
Wait in my lonely corner-this night
I will not go in this south wind drunk with delight.
Rather, this room with care
I must scour and cleanse and prepare;
For … if He remembers me, then
He will come, though I know not when;
They must wake me swiftly. I will not fare
Out where the drunk wind reels through the air.
–Edward Thomson, Rabindranath Tagore: The Augustan Books of Modern Poetry, Ernest Benn Ltd. London, 1925
हे गाणे गायले आहे सागर सेन ह्यांनी..