आधेक घुमे नयन चुमे ….

रवींद्र नाथाचे हे एक गीत बरेच दिवस मनात घोळतेय..ह्या गाण्यात कवी आपल्या जोडीदारा सोबत व्यतीत केलेले निवांत क्षण वर्णन करताहेत…

আধেক ঘুমে    নয়ন চুমে   স্বপন দিয়ে যায়।
শ্রান্ত ভালে    যূথীর মালে   পরশে মৃদু বায়॥
বনের ছায়া মনের সাথি,   বাসনা নাহি কিছু–
পথের ধারে আসন পাতি,   না চাহি ফিরে পিছু–
বেণুর পাতা   মিশায় গাথা   নীরব ভাবনায়॥
মেঘের খেলা গগনতটে   অলস লিপি-লিখা,
সুদূর কোন্‌ স্মরণপটে   জাগিল মরীচিকা।
চৈত্রদিনে তপ্ত বেলা   তৃণ-আঁচল পেতে
শূন্যতলে গন্ধ-ভেলা   ভাসায় বাতাসেতে–
কপোত ডাকে   মধুকশাখে   বিজন বেদনায়॥

हि कविता मराठीत…

आधेक घुमे नयन चुमे स्वपन दिये जाय…

(अर्धोन्मीलित स्वप्नाळू डोळे….)

श्रांत भाले जुथीर माले परशे मृदू बाय….

(जुईफुलाने सुवासित स्पर्शून वाहणारा वारा..)

बनेर छाया मनेर साथी वासना नाहि कि छू —

(हि तरु छाया आणि मनाजोगता साथीदार…आणि काय हवे???….)

पथेर धारे आसन पा ति, ना चाहि फिरे पिछु —

(पायवाटे जवळ अंथरलेले आसन ..नको वळून पहाणे …)

बेणू र पाता मिशाय गाथा नीरव भाबनाय …

(विचारांच्या आवर्तना सोबत डोलणारे हे वेणू बन ...)

मेघेर खेला गगन तटे अलश लिपी लिखा,

(आकाशात विहरणारे मेघ लिहिताहेत आळसावलेले काही बाही …)

सुदूर कोन स्मरण पटे जागिलो मरीचिका…

(स्मरताहेत काही दूरचे जुने क्षण….)

चैत्र दिने तप्त बेला तृण आंचल पेते ..

(चैत्रातील तप्त दुपार , ह्या गवतावर.…)

शून्य तले गंध भेला भाषाय वाताशेते —

(शून्य पणे वाहणारा गंधित वारा...)

कपोत डाके मधुक शाखे विजन वेदनाय….

(दूर कुठे तरी ऐकू येतेय कपोत कूजन…..)

हे गाणे ऐकुया श्री देवब्रत उर्फ जॉर्ज विश्वास ह्यांच्या सुरात…..

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