लहान मुलांना बांगला भाषा शिकवण्यासाठी रवींद्र नाथानी “सहज पाठ ” लिहिले..त्यात छोट्या छोट्या काव्यमय वाक्यातून बांगला वर्ण अक्षरे परिचित होतात..ह्या सहज पाठ मध्ये अ आणि आ शिकवतांना रवींद्र नाथ म्हणतात छोटो खोका बोले अ आ, शिखे नि शे कथा कोआ .. म्हणजे लहान बाळ बोलतेय अ आ , नाही अजून शिकलेय ते बोलायला..पुढे इ आणि ई शिकवताना ते म्हणतात , र्हस्व इ, दीर्घ ई , बोशे खाय खीर खोई..म्हणजे र्हस्व इ आणि दीर्घ ई, बसून खातात खीर खोई (खोई म्हणजे गोड कुरमुरे).. अशे मजेशीर रित्या रवींद्र नाथ अक्षर ओळख करून देतात..
त्याच सहज पाठ मधील हि एक कविता आज पाहूया..ह्या कवितेत ते शरद ऋतूचे आगमन वर्णन करताहेत..ह्यावेळी सृष्टीत काय काय बदल घडून येताहेत त्याची सुरेख दर्शन करून देतात त्याच वेळी वर्णाक्षरातील ए -कार शिकवतात…
এসেচে শরৎ, হিমের পরশ
লেগেচে হাওয়ার ‘পরে—
সকালবেলায় ঘাসের আগায়
শিশিরের রেখা ধরে।
আমলকী-বন কাঁপে,যেন তার
বুক করে দুরু দুরু—
পেয়েচে খবর পাতা-খসানোর
সময় হয়েচে শুরু।
শিউলির ডালে কুঁড়ি ভ’রে এল,
টগর ফুটিল মেলা,
মালতীলতায় খোঁজ নিয়ে যায়
মৌমাছি দুই বেলা।
গগনে গগনে বরষণ-শেষে
মেঘেরা পেয়েচে ছাড়া,
বাতাসে বাতাসে ফেরে ভেসে ভেসে,
নাই কোনো কাজে তাড়া।
দীঘিভরা জল করে ঢল-ঢল,
নানা ফুল ধারে ধারে,
কচি ধানগাছে ক্ষেত ভ’রে আছে—
হাওয়া দোলা দেয় তারে।
যে দিকে তাকাই সোনার আলোয়
দেখি যে ছুটির ছবি,
পূজার ফুলের বনে ওঠে ওই
পূজার দিনের রবি।
हि कविता मराठीत..
ए शे छे शरत हिमेर परश लेंगेछे हवार पोरे ..
(आलाय शरद ऋतू , हवेत आहे गारवा ..)
सकाळ बेलाय घाशेर आगाय शिशिरेर रेखा धरे ..
(रोज सकाळी गवतावर उमटतेय धुक्याची रेषा…)
आमलोकी बन कांपे जेनो तार बुक कोरे दुरु दुरु —
(डोलतेय आवळ्याचे वन, हृदयी त्याच्या धडधड ..)
पेयेंछे खबर पाता खाशानोर समय होयेछे सुरु ..
(जणू कळलंय त्यांना होईल आता पान गळती सुरु…)
शिवलिर डाले कुडी भोरे एलो तगर फुटिलो मेळा ..
(प्राजक्त भरून आलेय कळ्यांनी, तर तगर भरली फुलांनी…)
मालती लताय खोंज निये जाय मौमा छि दुई बेलाय ..
(आणि मधू मालतीच्या फुलाना मधमाशी भेटे दोन वेळा…)
गगने गगने बर श ण शेषे मेघेरा पेयेंछे छा डा ..
(पाऊस संपल्याने मेघ विहरताहेत आकाशी…)
बा ता शे बा ता शे फेरे भेशे भेशे , नाही कोनो काजे ता डा ..
(आळसावलेले आणि वाऱ्यावर लहरत..नाही त्यांना कसली घाई ..)
दिघी भरा जल कोरे ढल ढल , नाना फुल धारे धारे ..
(तलाव भरलेत पाण्याने..विविध फुले फुटलीयेत किनारी...)
कोची धान गाछे खेत भोरे आछे , हवा दोला देय तारे …
(शेतात आहेत कोवळी भात रोपे वाऱ्यावर डुलणारी...)
जे दिके ता का इ सोनार आलोय देखी जे छुटीर छोबि ..
(ज्या दिशेलाही पाहतो तिथे दिसतेय सोनेरी प्रकाशात सुट्टीची छबी…)
पुजार फुलेर बोने ओठे ओई पुजार दिनेर रॉबी …
(पूजेच्या फुलवनात उगवलाय तो पूजेचा रवी…[म्हणजे च आता दुर्गा पूजेची आणि दुर्गा पूजेच्या सुट्टीचे चाहूल लागलेय…:])
ह्या कवितेची आवृत्ती ऐकुया श्री सुदीप सिन्हा ह्यांच्या आवाजात..
हीच कविता रिषिता नावाच्या एका छोट्या मुलीने पण खूप छान म्हटलेय… ती ऐकुया इथे..