ओई जे झडेर मेघेर कोले …

इथे आता चांगलाच पाऊस सुरु झालाय..इतके दिवस जे वणवे जंगलात चालू होते..ते पण बरेचसे ह्या पावसात विझून जात आहेत..सगळी कडे हिरवेगार कुरणे आणि तुडुंब भरलेली नद्या तलाव सर्वानाच आनंद देताहेत…

रवींद्र नाथाचे हे पाऊस गाणे पाहूया..रवींद्र नाथानी शांतिनिकेतन मध्ये विविध ऋतू साजरे करणारे उत्सव सुरु केले..वसंतोत्सव, वर्षामंगल, पौष मेळा हे तिथले उत्सव खूपच प्रसिद्ध..देशो देशीचे लोक तिथे ह्या वेळी भेट देतात.. हे गाणे सण १९२२ च्या श्रावण महिन्यातील वर्षा मंगल उत्सवात प्रथम गायले गेले..

ওই-যে ঝড়ের মেঘের কোলে
       বৃষ্টি আসে মুক্তকেশে আঁচলখানি দোলে॥
ওরই গানের তালে তালে   আমে জামে শিরীষ শালে
       নাচন লাগে পাতায় পাতায় আকুল কল্লোলে॥
           আমার   দুই আঁখি ওই সুরে
       যায় হারিয়ে সজল ধারায়   ওই ছায়াময় দূরে।
ভিজে হাওয়ায় থেকে থেকে   কোন্‌ সাথি মোর যায় যে ডেকে,
       একলা দিনের বুকের ভিতর ব্যথার তুফান তোলে॥

हे गाणे मराठीत…

ओई जे झडेर मेघेर कोले

(झड – वादळी पाऊस…कोले – कूस ..)

वृष्टी आशे मुक्त केशे आंचल खानी दो ले …

(आंचल खानि – पदर , दो ले – डुलणे ..)

ओ र ई गा नेर ताले ताले आमे जामे शिरीष शाले

(आम , जाम , शिरीष , शाल — आंबा, जांभूळ , शिरीष आणि शाल वृक्ष ..)

नाच न लागे पाताय पाताय आकुल कल्लोले ..

(पाताय — पाने…)

आमार दु इ आखि ओई सुरे

जाय हारिये सजल धाराय ओई छायामय दुरे ..

( हारिये हरवून ..)

भिजे हवाय थेके थेके कोन साथी मोर जाय जे डेके ,

( भिजे हवाय थेके थेके सजल वाऱ्यातून., मोर – मला, डे के – बोलावणे…)

एकला दिनेर बुकेर भीतर व्यथार तुफान तोले…

(एकला – एकाकी, बुकेर भीतर – हृदयी ..)

हे गाणे ऐकुया श्रीमती सुचित्रा मित्र ह्यांच्या आवाजात…

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.