ओई बुझि कालवैशाखी …

कमी झालेले पर्जन्य मान आणि वाढलेले तापमान, ह्या मुळे इथे बऱ्याच जागी जंगलात वणवे लागले..जीवित आणि वित्त हानी पण खूप झाली.. सगळेच पाऊस पडावा म्हणून प्रार्थना करत होते..सुदैवाने दोन चक्री वादळे गेल्या आठवड्यात बऱ्यापैकी पाऊस घेऊन आली..त्यामुळे सर्वानी सुटकेचा निश्वास सोडला..

उन्हाळ्यात होणाऱ्या ह्या चक्री वादळांना बांगला भाषेत काल वैशाखी म्हणतात..ह्या काल वैशाखी संबधी रवींद्र नाथाची हि कविता..

ওই বুঝি কালবৈশাখী
           সন্ধ্যা-আকাশ দেয় ঢাকি
ভয় কী রে তোর ভয় কারে,   দ্বার খুলে দিস চার ধারে
শোন্‌ দেখি ঘোর হুঙ্কারে   নাম তোরই ওই যায় ডাকি॥
           তোর সুরে আর তোর গানে
           দিস সাড়া তুই ওর পানে।
যা নড়ে তা দিক নেড়ে,   যা যাবে তা যাক ছেড়ে
যা ভাঙা তাই ভাঙ্বে রে– যা রবে তাই থাক বাকি॥

हीच कविता मराठी त —

ओई बुझि कालवैशाखी

(हि तर काल वैशाखी …)

संध्या आकाश देय ढाकि

(झाकोळून टाकतेय संध्या आकाश..)

भय कि रे तोर भय कारे, द्वार खुले दिस चार धारे

(भय कशाचे आणि कशाला ..दे उघडून चारी द्वार…)

शोन दे खि घोर हुंकारे नाम तोर इ ओई जाय डाकि …

(ऎक , तुझेच नाव हुंकारतेय हि काळ वैशाखी…)

तोर सुरे आर तोर गाने

(तुझ्या सूर तालाने ..)

दिस शा डा तुई ओर पाने —

(तू तिला ओ दे… शा डा – ओ , प्रतिसाद ..)

जा नोडे ता दिक नेडे , जा जाबे ता जाक छेडे

(जे वाकेल तो वाकू देत , जे जाईल ते जाऊ देत….)

जा भांगा ताई भान्गबे रे — जा रबे ताई थाक बाकि …

(जे तुटेल ते तुटू देत..जे राहील तेच राहू देत…..)

हे गाणे ऐकुया श्रीमती सुचित्रा मित्र ह्यांच्या आवाजात —–

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.