परत एकदा रवींद्र नाथाच्या गाण्याकडे वळूया….
इथे आता वसंत ऋतूची चाहूल लागलीय..पावसा अभावी जॅकरांडा, पिंक शॉवर हि फुल झाडे अजून बहरून आली नाहीयेत..पण आंब्याला सुंदर मोहोर आलाय..आमच्या घर जवळच एक गुरुद्वारा आहे.. समोर मोठी आंब्याची बाग..बागेतले प्रत्येक झाड मोहोराचे लगडलय …
आंब्याच्या मोहोराला बांगला भाषेत म्हणतात..’आमेर मुकुल’ किंवा ‘आमेर मंजिरी’..ह्या ‘आमेर मंजिरी’ ला उद्देशून लिहिलेले हे वसंत गाणे..
ও মঞ্জরী, ও মঞ্জরী আমের মঞ্জরী,
আজ হৃদয় তোমার উদাস হয়ে পড়ছে কি ঝরি॥
আমার গান যে তোমার গন্ধে মিশে দিশে দিশে
ফিরে ফিরে ফেরে গুঞ্জরি॥
পূর্ণিমাচাঁদ তোমার শাখায় শাখায়
তোমার গন্ধ-সাথে আপন আলো মাখায়।
ওই দখিন-বাতাস গন্ধে পাগল ভাঙল আগল,
ঘিরে ঘিরে ফিরে সঞ্চরি॥
हेच गाणे मराठी त..
ओ मंजरी, ओ मंजरी आमेर मंजरी ,
(हे मंजिरी , आम्र मंजिरी..)
आज हृदय तोमार उदास होये पड छे कि झरी ..
(अशी उदास का ग तू ??)
आमार गान जे तोमार गंधे मिशे ..दिशे दिशे
(माझे हे गाणे तुझ्या सुवासात [होऊन]एकरूप )
फिरे फिरे फेरे गुंजरी ….
(फिरे चारी दिशी..)
पूर्णिमा चांद तोमार शाखाय शाखाय
(पौर्णिमेचे हे चांदणे [तुझ्या ] सर्वांगि )
तोमार गंध साथे आपन आलो माखाय ..
([तुझ्या] सुवासासवे होई एकरूप )
ओइ दखिन बाता स गंधे पागल भांगलो आगोल ,
([आणि] ह्या वाऱ्याने तर तोडले सारे बंधन ..[दखिन – दक्षिण , आगोल – बंधन)]
घिरे घिरे फिरे संचरि …
[घेई गिरक्या तुझ्याच सभोवती..]
हे गाणे इथे देत आहे सुचित्रा मित्र ह्यांच्या आवाजात..