खांचार पाखि ओ बनेर पाखि

..आता हे आणखी एक रवींद्रनाथांनी रचलेले दोन पाखरांची गोष्ट सांगणारे गाणे ..एक पाखरू सोन्याच्या पिंजऱ्यात राहत असते.. (खांचा म्हणजे पिंजरा) तर एक वन जंगलात स्वच्छंद उडणारे पाखरू..ह्या दोघांची एकदा होते भेट आणि पुढे काय ते ह्या गाण्यात सांगितले आहे..

খাঁচার পাখি ছিল    সোনার খাঁচাটিতে,    বনের পাখি ছিল বনে।
          একদা কী করিয়া মিলন হল দোঁহে,    কী ছিল বিধাতার মনে।
          বনের পাখি বলে, ‘খাঁচার পাখি ভাই,    বনেতে যাই দোঁহে মিলে।’
          খাঁচার পাখি বলে, ‘বনের পাখি আয়,   খাঁচায় থাকি নিরিবিলে।’
          বনের পাখি বলে, ‘না,   আমি শিকলে ধরা নাহি দিব।’
          খাঁচার পাখি বলে, ‘হায়,   আমি কেমনে বনে বাহিরিব।’ 

          বনের পাখি গাহে বাহিরে বসি বসি    বনের গান ছিল যত,
          খাঁচার পাখি গাহে শিখানো বুলি তার—  দোঁহার ভাষা দুইমত। 
          বনের পাখি বলে ‘খাঁচার পাখি ভাই,   বনের গান গাও দেখি।’
          খাঁচার পাখি বলে, ‘বনের পাখি ভাই,   খাঁচার গান লহো শিখি।’
          বনের পাখি বলে, ‘না,   আমি   শিখানো গান নাহি চাই।’
          খাঁচার পাখি বলে, ‘হায়   আমি  কেমনে বনগান গাই।’ 

          বনের পাখি বলে, ‘আকাশ ঘন নীল   কোথাও বাধা নাহি তার।’
          খাঁচার পাখি বলে, ‘খাঁচাটি পরিপাটি   কেমন ঢাকা চারিধার।’
          বনের পাখি বলে, ‘আপনা ছাড়ি দাও   মেঘের মাঝে একেবারে।’
          খাঁচার পাখি বলে, ‘নিরালা কোণে বসে   বাঁধিয়া রাখো আপনারে।’
          বনের পাখি বলে, ‘না,   সেথা   কোথায় উড়িবারে পাই!’
          খাঁচার পাখি বলে, ‘হায়,   মেঘে   কোথায় বসিবার ঠাঁই।’ 

          এমনি দুই পাখি দোঁহারে ভালোবাসে,    তবুও কাছে নাহি পায়।
          খাঁচার ফাঁকে ফাঁকে পরশে মুখে মুখে,   নীরবে চোখে চোখে চায়।
          দুজনে কেহ কারে বুঝিতে নাহি পারে,   বুঝাতে নারে আপনায়।
          দুজনে একা একা ঝাপটি মরে পাখা—কাতরে কহে, ‘কাছে আয়!’
          বনের পাখি বলে, ‘না,    কবে    খাঁচায় রুধি দিবে দ্বার!’
          খাঁচার পাখি বলে, ‘হায়,   মোর  শকতি নাহি উড়িবার।’

आता हे गाणे मराठीत लिहूया..

खाचार पा खि छि लो सोनार खाचा टी ते , बनेर पा खि छि लो बने ..

(एक वन पक्षी , तर एक सोन्याच्या पिंजऱ्यात राहणार पक्षी )

एकदा कि करिया मिलन होलो दोहे , कि छि लो विधातार मने ..

(काय त्या परमेश्वराच्या मनात होते काय जाणे, दोन पक्षांची झाली एकदा भेट)

बनेर पा खि बोले , ‘खाचार पा खि भाई , बनेते जाई दोहे मिले ‘..

(वन पक्षी बोले, ‘ हे भाई, चल जंगलात जावूया ‘)..

खाचार पा खि बोले , ‘बनेर पा खि आय , खा चा य था कि निरि बिले’..

(पिंजर्यांतला पक्षी सांगे, ‘ ये, आपण पिंजऱ्यात राहूया ‘ (निरीबिले – शांत पणे )..)

बनेर पा खि बोले, ‘ ना , आमि शिकले धरा नाहि दिबो ‘..

(वन पक्षि बोले, ‘ना , मला नाही साखळी त बांधून घ्यायचे …[शिकलं – साखळी ]’)

खा चा र पा खि बोले, ‘ हाय , आमि केमोने बने बाहिरीबो ‘…

( पिंजर्यांतला पक्षी सांगे , ‘मी कसा वनात जाऊ???‘)

बनेर पा खि गाहे बाहिरे बोशे बोशे , बनेर गान छि लो जतो ..

(वन पक्षी गातो सुंदर जंगल गाणी ..)

खा चा र पा खि गाहे शिखानो बोली तार – दोहार भाषा दुई मतो ..

(तर पिंजऱ्यातील पक्षि गातो त्याला शिकवलेली गाणी..दोघांची भाषा पण वेगळी..)

बनेर पा खि बोले , ‘खा चा र पा खि भाई , बनेर गान गाओ देखि ..’

(वन पक्षी बोले, ‘ हे भाई, वन गाणी गाऊया ‘…)

खा चा र पा खि बोले, ‘बनेर पा खि भाई , खा चा र गान लहो शिखि ‘..

( पिंजर्यांतला पक्षी सांगे , ‘अरे भाई, इथले गाणे घे शिकुन .’.)

बनेर पा खि बोले, ‘ना, आमि शिखानो गान नाहि चाई ‘…

(वन पक्षी बोले, ‘ मला नको कुणी शिकवलेलं गाणे ..’)

खा चा र पा खि बोले, ‘हाय , आमि केमोने बन गान गाई ..’

( पिंजर्यांतला पक्षी सांगे , ‘मी कसा वन गाणी गाऊ ‘..;)

बनेर पा खि बोले, ‘ आकाश घन नील , कोथा ओ बाधा नाहि तार ‘..

(वन पक्षी बोले, ‘ आकाश घन नील, कुठं नाही बंधन..’)

खा चा र पा खि बोले ‘ खाचा टि परिपाटि केमॉन ढाका चारि धार ‘..

( पिंजर्यांतला पक्षी सांगे , ‘हा पिंजरा किती सुरक्षित..’)

बनेर पा खि बोले, ‘ आपना छा डि दाओ , मेघेर माझे एके बारे ‘..

(वन पक्षी बोले, ‘ एकदा सोडून द्यावे स्वतःला उंच मेघांमध्ये ‘..)

खा चा र पा खि बोले, ‘ निराला कोने बोशे , बांधिया राखों अपानारे ‘..

( पिंजर्यांतला पक्षी सांगे , ‘हे पिंजऱ्याचे बंधन किती सुखकारी’..)

बनेर पा खि बोले, ‘ ना, शेथा कोथा य उडीबार पायी ‘..

(वन पक्षी बोले, ‘ ना, (पिंजऱ्यात) उडता कुठं येते..’)

खा चा र पा खि बोले, ‘ हाय, मेघे कोथा य बोशीबर ठाई ‘…

( पिंजर्यांतला पक्षी सांगे , ‘अरे, आकाशात जागा कुठंय बसायला..’)

एमनी दुई पा खि दोहारे भालो बा शे , त बु ओ का छे नाहि पाय..

(अशी हे दोन पाखरे..नाहि काही समजत ..)

खा चा र फांके फांके परशे मुखे मुखे , निरबे चोखे चोखें चाय ..

(एकमेका करूण पणे पाहात ..)

दुजोने केह कारे बुझिते नाहि पारे , बोझाते नारे आपनाय ..

(एकमेकांना समाजवातेहेत..)

दुजोने एका एका झापोटी मारे पा खा , कातरे कहे, ‘का छे आय’…

(तू ये … नाही .. तू ये..)

बनेर पा खि बोले, ‘ना, कबे खाचा र रु धि दि बे द्वार ‘…

(वन पक्षी बोले, ‘कधी तोडणार ह्या पिंजऱ्याचे दार???’)

खा चा र पा खि बोले, ‘ हाय, मोर शकतिं नाहि उडि बार ‘..

( पिंजर्यांतला पक्षी सांगे , ‘अरे, माझ्यात नाहीय उडण्याचे सामर्थ्य ‘..)

हे गाणे सुचित्रा मित्र यांच्या आवाजात इथे ऐकुया …

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