श्राबोनेर धारार मतो …

रवींद्र नाथांच्या कविता मुख्यतः तीन प्रकारात विभागल्या आहेत..’पूजा पर्याय’ म्हणजे परमेश्वराला उद्देशून केलेल्या कविता..’प्रकृती पर्याय’ कविता ह्या निसर्ग विषयक कविता..आणि ‘प्रेम पर्याय’ कविता..बांगला भाषेत य चा काही वेळा उच्चार ज असा होतो त्यामुळे पर्याय शब्द उच्चारला जातो ‘पर्जाय’ असा..

हे श्रावण गाणे आहे ‘पूजा प र्जा य गान’ …परमेश्वराला उद्देशून केलेले..

শ্রাবণের     ধারার মতো পড়ুক ঝরে, পড়ুক ঝরে
     তোমারি     সুরটি আমার মুখের ’পরে, বুকের ’পরে॥
     পুরবের     আলোর সাথে পড়ুক প্রাতে দুই নয়ানে–
     নিশীথের     অন্ধকারে গভীর ধারে পড়ুক প্রাণে।
     নিশিদিন     এই জীবনের সুখের ’পরে, দুখের ’পরে
     শ্রাবণের     ধারার মতো পড়ুক ঝরে, পড়ুক ঝরে॥
     যে শাখায়    ফুল ফোটে না, ফল ধরে না একেবারে,
     তোমার ওই   বাদল-বায়ে দিক জাগায়ে সেই শাখারে।
     যা-কিছু      জীর্ণ আমার, দীর্ণ আমার, জীবনহারা,
     তাহারি       স্তরে স্তরে পড়ুক ঝরে সুরের ধারা।
     নিশিদিন      এই জীবনের তৃষার ’পরে, ভুখের ’পরে
     শ্রাবণের      ধারার মতো পড়ুক ঝরে, পড়ুক ঝরে॥

हे गाणे मराठीत ..

श्राबनेर धारार मतो पोडूक झोरे, पोडूक झोरे

(ह्या श्रावण धारा सम बरसू देत )

तोमारि सुरटि आमार मुखेर परे, बुकेर परे ..

(तुझेच सुर माझ्या सर्वांगावर )

पूरबेर आलोर साथे पोडूक प्राते दुई नयने –

(पूर्वेच्या प्रकाशातुन [बरसू देत ] दोन्ही नयनात )

निशीथेर अंधकारे गभीर धारे पोडूक प्राणे .

(रात्रीच्या गंभीर अंधारात [बरसू देत] मनात )

निशिदिन ए इ जीवनेर सुखेर परे , दुःखेर परे

(हर सुख दुःखात )

श्राबनेर धारार मतो पोडूक झोरे, पोडूक झोरे

( ह्या श्रावण धारा सम बरसू देत )

जे शाखाय फुल फोटे ना, फल धोरे ना एके बारे,

(फुल फळ हीन ह्या शुष्क वेलीवर )

तोमार ओ इ बादल बाये दि क जागाये शे इ शाखारे ..

((तुझ्या) मेघ वायूने फुटू देत [नूतन] प्राण)

जा किछू जीर्ण आमार, दीर्ण आमार, जीवनहारा,

(जे [काही] जीर्ण , दीर्ण माझे}

ताहा रि स्तरे स्तरे पोडूक झरे सुरेर धारा ..

(त्यावर बरसू देत [तुझी] सुरधारा )

निशिदिन ए इ जीवनेर तृषार पोरे , भुकेर पोरे ..

([माझ्या ह्या] तृषार्त मनावर प्रतिदिन)

श्राबनेर धारार मतो पोडूक झोरे, पोडूक झोरे

(ह्या श्रावण धारा सम बरसू देत..[तुझे सूर ])

रवींद्र नाथांची पुतणी इंदिरा देवी ह्यांनी त्यांच्या आठवणी लिहिताना म्हटलेय “नाटोर (सध्या बांगला देशात) चे राजा जगदिं द्र नाथ हे गाणे ऐकून म्हणाले, रबिबाबूना गीतांजली साठी नोबेल मिळाले पण ह्या गाण्यासाठी त्याना परत एकदा नोबेल दिले पाहिजे….” (इंदिरा देवी, स्मृती सम्पद , ३ खंड, विश्व भा रती ).

हे गाणे इथे देत आहे ऋतू गुह ह्यांच्या आवाजात..

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