काल पासून पावसाची रिम झिम सुरु झालेय…दाटून आलेले मेघ, गार वारा आणि बरसणारा पावसाच्या लयीतील हे रवींद्र गीत ऐकुया..
গহন ঘন ছাইল গগন ঘনাইয়া।
স্তিমিত দশ দিশি, স্তম্ভিত কানন,
সব চরাচর আকুল — কী হবে কে জানে।
ঘোরা রজনী, দিকললনা ভয়বিভলা॥
চমকে চমকে সহসা দিক উজলি
চকিতে চকিতে মাতি ছুটিল বিজলি
থরথর চরাচর পলকে ঝলকিয়া
ঘোর তিমিরে ছায় গগন মেদিনী।
গুরু গুরু নীরদগরজনে স্তব্ধ আঁধার ঘুমাইছে,
সহসা উঠিল জেগে প্রচণ্ড সমীরণ — কড়কড় বাজ।
हे गाणे मराठीत..
गहन घन छाइलो गगन घनाइया.
(छाइलो – व्यापणे, आच्छादणे ..)
स्तिमित दश दिशि , स्तंभित कानन,
सब चराचर आकूल — कि हॉबे के जाने ..
(आकूल – व्याकुळ , कि हॉबे के जाने – काय होणारे कुणास ठाऊक??)
घोरा रजनी , दिक ललना भय विभला ..
(घोरा रजनी – गर्द काळी रात्र ..)
चमके चमके सहसा दिक उजली ..
चकीते च कि ते माती छुटिलो बिजली
थरथर चराचर पलके झलकीया
घोर तिमिरे छाय गगन मेदिनी
गुरु गुरु नीरद गरजने स्तब्ध आंधार घुमाईछे,
(नीरद गरजने – मेघ गर्जना , घुमाईछे – झोपलाय…)
सहसा उठिलो जेगे प्रचंड समीरण — कडकड बाज …
(बाज – विदयुत , वीज..)
हे गाणे समूह स्वरात ऐकुया..