हि कविता रवींद्र नाथानी काश्मीर ची राजधानी श्रीनगर च्या वास्तव्यात रचली.. तिथल्या निसर्ग सौन्दर्याचे वर्णन ह्या कवितेत ते करताहेत..आणि ते स्वतः पण ह्या निसर्गाचाच एक अविभज्य भाग आहेत ह्याची ग्वाही देत आहेत..
তরুণ প্রাতের অরুণ আকাশ শিশির-ছলোছলো,
নদীর ধারের ঝাউগুলি ঐ রৌদ্রে ঝলোমলো।
এমনি নিবিড় ক’রে এরা দাঁড়ায় হৃদয় ভ’রে–
তাই তো আমি জানি বিপুল বিশ্বভুবনখানি
অকূল-মানস-সাগর-জলে কমল টলোমলো।
তাই তো আমি জানি– আমি বাণীর সাথে বাণী,
আমি গানের সাথে গান, আমি প্রাণের সাথে প্রাণ,
আমি অন্ধকারের হৃদয়-ফাটা আলোক জ্বলোজ্বলো॥
हि कविता मराठीत..
तरुण प्रा ते र अरुण आकाश शिशिर – छ लो छ लो,
नदी र धारेर झाऊ गुलि एइ रौद्रे झ लो मलो ..
(झाऊ गुलि – देवदार वन ..)
ए मो नि निबिड कोरे एरा दांडाय हृदय भरे —
ताई तो आमि जानि विपुल विश्व भुवन खानि
(ताई तो — म्हणून च )
अकुल – मानस – सागर – जले कमल ट लो म लो ..
ताई तो आमि जानि — आमि वाणीर साथे वाणी ,
आमि गानेर साथे गान, आमि प्राणेर साथे प्राण ,
आमि अंधकारेर हृदय फोटा आलोक ज्व लो ज्व लो …
(मी अंधाराचे हृदय भेदून उमटलेली एक प्रकाश रेखा….)
हे गाणे ऐकुया श्रीमती रमा मंडल ह्यांच्या आवाजात..