हि एक प्रेम कविता…..तुमि कोन काननेर फूल …रवींद्रनाथानी हि कविता सन १८८६ मध्ये रचली….ह्या कवितेची संगीत रचना आहे रवींद्रनाथाचे मोठे भाऊ ज्योतींद्रनाथ ह्यांची..खूपच सुंदर कविता….
তুমি কোন্ কাননের ফুল, কোন্ গগনের তারা।
তোমায় কোথায় দেখেছি যেন কোন্ স্বপনের পারা॥
কবে তুমি গেয়েছিলে, আঁখির পানে চেয়েছিলে
ভুলে গিয়েছি।
শুধু মনের মধ্যে জেগে আছে ওই নয়নের তারা॥
তুমি কথা কোয়ো না, তুমি চেয়ে চলে যাও।
এই চাঁদের আলোতে তুমি হেসে গ’লে যাও।
আমি ঘুমের ঘোরে চাঁদের পানে চেয়ে থাকি মধুর প্রাণে,
তোমার আঁখির মতন দুটি তারা ঢালুক কিরণধারা॥
हे गाणे मराठीत..
तुमि कोन काननेर फूल, कोन गगनेर तारा …
(तू कुठल्या बागेतले फुल , कुठल्या नभातील चांदणी..)
तोमाय कोथाय देखे छि जेनो कोन स्वप्नेर पारा …
(कुठल्या स्वप्न प्रदेशात बघितले तुला मी..)
कबे तुमि गेये छिले, आंखि र पाने चे ये छिले, भूले गिये छि … ..
(कधी ऐकले (होते) सूर तुझे, ती नजर भेट, विसरलो मी सगळे.. )
शुधू मनेर मध्ये जेगे आ छे ओई नयनेर तारा ..
(आठवतात फक्त तुझे डोळे….)
तुमि कथा कोयो ना, तुमि चेये चोले जाओ ..
(निःशब्द तू …(आणि ) तुझे ते निरखून पाहणे (आणि) निघून जाणे……)
एइ चांदेर आलो ते तुमि हेशे गोले जाओ ..
(ह्या चांदण्यात हसून विरघळून जातेस तू…)
आमि घुमेर घोरे चांदेर पाने चे ये था कि मधूर प्राणे ,
(चांदण्या रात्री , तुझ्या आठवणींत मंत्र मुग्ध मी…)
तोमार आंखिर मोतोन दुटि तारा ढालुक किरण धारा …
( तुझ्या दोन नयनासम तार्यातून बरसू देत किरण धारा…..)
हे गाणे गायले आहे आशा भोसले ह्यांनी..इतके सुंदर..पुन्हा पुन्हा ऐकावेसे वाटते….