नील आकाशेर कोने कोने …

रवींद्र नाथाचे हे एक प्रकृती (निसर्ग) परजायेर गीत आज ऐकुया…

নীল আকাশের কোণে কোণে ওই বুঝি আজ শিহর লাগে,   আহা।
শাল-পিয়ালের বনে বনে কেমন যেন কাঁপন জাগে,   আহা॥
      সুদূরে কার পায়ের ধ্বনি   গণি গণি দিন-রজনী
           ধরণী তার চরণ মাগে   আহা॥
দখিন-হাওয়া ক্ষণে ক্ষণে কেন ডাকিস ‘ জাগো জাগো’।
ফিরিস মেতে শিরীষবনে, শোনাস কানে কোন্‌ কথা গো।
      শূন্যে তোমার ওগো প্রিয়   উত্তরীয় উড়ল কি ও
          রবির আলোর রঙিন রাগে   আহা॥

हे गाणे मराठीत…

नील आकाशेर कोने कोने ओ इ बुझि आज शिहर लागे , आहा …

(शिहर – शिरशिरी ..)

शाल पियालेर बने बने केमॉन जेनो कांपोन जागे, आहा ..

सुदूरे कार पायेर ध्वनी गोनि गोनि दिन रजनी …

(गोनि – गणना करणे...)

धरणी तार चरण मागे आहा…

दखिन हवा खणे खणे केनो डाकिस ‘जागो जागो’..

(दखिन हवा – दक्षिणे कडून वाहणारा वारा (बंगालच्या उपसागराकडून येणारा . म्हणजेच वसंत ऋतू किंवा उन्हाळा..हिवाळ्यात वाहणाऱ्या वाऱ्याला उत्तुरे हवा (म्हणजे हिमालयाकडून ) उत्तरे कडून वाहणारा म्हणतात…..खणे– क्षणे ..)

फिरिस मेते शिरीष बने, शोनास काने कोन कथा गो ..

शून्ये तोमार ओ गो प्रिय उत्तरीय उडलो कि ओ

रबीर आलो र रंगीन रागे ..आहा…

हे गाणे ऐकुया श्रीमती रमा मंडल ह्यांच्या आवाजात…

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.