हे एक बाऊल गाणे आहे..रवींद्र नाथाच्या प्रायश्चित्त ह्या नाटकातले…ह्या गाण्यात ते परमेश्वराला उद्देशून म्हणतात..वाचवलेस तर वाचेन..मारलेस तर मरेन..सगळी त्या हरिचीच कृपा..सर्व काही त्या परमेश्वराचीच इच्छा…
বাঁচান বাঁচি, মারেন মরি–
বলো ভাই ধন্য হরি॥
ধন্য হরি ভবের নাটে, ধন্য হরি রাজ্যপাটে,
ধন্য হরি শ্মশানঘাটে, ধন্য হরি, ধন্য হরি।
সুধা দিয়ে মাতান যখন ধন্য হরি, ধন্য হরি।
ব্যথা দিয়ে কাঁদান যখন ধন্য হরি, ধন্য হরি।
আত্মজনের কোলে বুকে ধন্য হরি হাসিমুখে,
ছাই দিয়ে সব ঘরের সুখে ধন্য হরি, ধন্য হরি॥
আপনি কাছে আসেন হেসে ধন্য হরি, ধন্য হরি।
ফিরিয়ে বেড়ান দেশে দেশে ধন্য হরি, ধন্য হরি।
ধন্য হরি স্থলে জলে, ধন্য হরি ফুলে ফলে,
ধন্য হৃদয়পদ্মদলে চরণ-আলোয় ধন্য করি॥
हे गाणे मराठीत…
बाचान बां चि , मारेन मोरी–
(वाचवलेस तर वाचेन..मारलेस तर मरेन….)
बोलो भाई धन्य हरि ….
(त्या हरिचीच कृपा….)
धन्य हरि भ बे र नाटे , धन्य हरि राज्य पाटे,
(धरातली तूच हरी…सर्व राज्यात तूच हरि ….)
धन्य हरि श्मशान घाटे , धन्य हरि, धन्य हरि …
(तूच हरि स्मशान घाटी..)
सुधा दिये माता न जख न धन्य हरि, धन्य हरि …
(आनंद काली हि तूच हरि .. सुधा – अमृत , मा ता न – मत्त, ज ख न – जेव्हा ..)
व्यथा दिये का दा न जख न धन्य हरि, धन्य हरि …
(व्यथेने रडताना पण तूच हरि .. का दा न – रडू..)
आत्म जनेर कोले बुके धन्य हरि हाशी मुखे,
(प्रिय जनाच्या हाशी ख़ुशी हि तुझीच इच्छा…)
छाई दिये सब घरेर सुखे धन्य हरि, धन्य हरि …
(घराची राख रांगोळी हि पण तुझीच इच्छा…छाई – राख ..)
आप नि काछे आशे न हेशे धन्य हरि, धन्य हरि …
(स्थिर होऊन तुझा सहवास हि तुझीच इच्छा ..)
फिरीये बेडाय देशे देशे धन्य हरि , धन्य हरि …
(देश विदेश भ्रमण हि पण तुझीच इच्छा…)
धन्य हरि स्थळे जले , धन्य हरि फुले फले,
(जल स्थळी तूच एक, फुले फळात हि तूच.…)
धन्य हृदय पद्म दले चरण आलोय धन्य कोरी..
(तोच हरि हृदय तळी ..आत्म प्रकाशी धन्य करी…)
हे गाणे ऐकुया सुचित्रा मित्र ह्यांच्या आवाजात…